माता कात्यायनी प्रतिशोध की नहीं बल्कि शोध की देवी
ऋषिकेश– परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने आज नवरात्रि के छटवें दिन अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में माता कात्यायनी देवी के स्वरूप का वर्णन करते हुये कहा कि नवरात्रि के छटवें दिन साधकों ने अपनी साधना के दौरान आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाते हुये़ स्थिर मन से माँ कात्यायनी देवी के स्वरूप का ध्यान किया। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि नवरात्रि के छटवें दिन माता कात्यायनी देवी की पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित हो कर निष्ठापूर्वक ध्यान करे। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। माँ कात्यायनी की उपासना से भक्तों में आरोग्य की वृद्धि होती है। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि माता कात्यायनी प्रतिशोध की नहीं बल्कि शोध की देवी है। उनका ध्यान करते हुये जीवन को प्रतिशोध की ओर नहीं बल्कि शोध की ओर लेकर जायें अर्थात जीवन में प्रतिशोध नहीं बल्कि शोध हो। शोध यात्रा ही सिद्धि और शुद्ध की यात्रा है।

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