दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास सोमवार शाम हुए भीषण धमाके में 8 लोगों की मौत और 20 घायल धमाका
देश की राजधानी दिल्ली में धमाके के बाद पुराने धमाकों की यादें ताजा हो गई हैं। देश की यह राजधानी बार-बार आतंकवादियों के निशाने पर रही. यह धमाका महज एक इकलौती घटना नहीं, बल्कि 1990 के दशक के बाद से राजधानी में हुए सिलसिलेवार धमाकों की एक लंबी और दर्दनाक कड़ी का हिस्सा है। दिल्ली को दहलाने वाली इन आतंकी वारदातों की शुरुआत 1996 में हुई थी, जब 21 मई 1996 को लाजपत नगर सेंट्रल मार्केट में हुए भीषण बम विस्फोट ने देश को स्तब्ध कर दिया था. शाम के समय में हुए इस धमाके में 13 लोगों की मौत हुई थी, जबकि दर्जनों घायल हुए थे. इस हमले की जिम्मेदारी जम्मू-कश्मीर इस्लामिक फ्रंट ने ली थी और इसने दिल्ली के बाजारों में डर का एक नया बीज बो दिया था।इसके ठीक एक साल बाद 1997 का साल तो दिल्ली के लिए आतंक का पर्याय बन गया. इस वर्ष राजधानी में एक के बाद एक कई सीरियल ब्लास्ट हुए. अक्टूबर 1997 में शांतिवन, कौड़िया पुल और किंग्सवे कैंप जैसे इलाकों में तीन विस्फोट हुए, जिसके बाद करोल बाग और रानी बाग मार्केट को भी निशाना बनाया गया. इसी क्रम में, 30 नवंबर 1997 को लाल किले के आसपास हुए जुड़वां विस्फोटों में 3 लोगों की मौत हुई और 70 लोग घायल हुए थे, जिसने पुरानी दिल्ली को दहला कर रख दिया था. साल का अंत पंजाबी बाग के पास चलती बस में हुए विस्फोट के साथ हुआ था। देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर सोमवार शाम को धमाके से दहल उठी. लाल किला मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर वन के पास एक कार में बड़ा धमाका हुआ, जिसकी चपेट में आसपास मौजूद कई गाड़ियां आ गईं. विस्फोट इतना बड़ा था कि हर तरफ आग और धुआं नजर आ रहा था. ब्लास्ट की सूचना मिलते ही एंबुलेंस और दमकल की कई गाड़ियां मौके पर पहुंच गई. घायलों को आनन-फानन में LNJP अस्पताल में भर्ती कराया गया. इलाके में बड़ी संख्या में पुलिस बलों की तैनाती की गई और NIA और NSG की टीम भी मौके पर पहुंची. इस हादसे में 9 लोगों की मौत होने की सुचना है। 20 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. यह संख्या बढ़ भी सकती है।

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