सरकार की अनदेखी के कारण अपनी पहचान खोने को मजबूर पंचालेश्वर स्थान
लक्सर क्षेत्र में बाणगंगा किनारे बना पौराणिक तीर्थ स्थल पंचालेश्वर आज अपनी पहचान खोने को मजबूर है। पंचालेश्वर स्थान की पहचान आज सरकार की अनदेखी के कारण दम तोड़ रही है।जिससे आसपास के ग्रामीणों में काफी रोष है
लंबे समय से चल रही मांग की तरफ मौजूदा सरकार का कोई ध्यान नहीं है।नीलधारा गंगा का तटबंध बनाकर बाणगंगा के अस्तित्व को लगभग मिटा दिया गया है।यही वजह है कि बाढ़ गंगा किनारे बने कई तीर्थ स्थल अपनी पहचान खो रहे हैं।जिनमें मुख्यत पंचालेश्वर है जो देश का एकमात्र ऐसा स्थान है।जहां गंगा पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। पंचालेश्वर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है यह वह स्थान है। जहां पांडव के पूर्वजों ने अपने प्राण त्यागे थे कहा जाता है।कि पांडवों ने अज्ञातवास का कुछ समय यही गुजारा था।उस समय पांडव ने इस पंचेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण किया था। हमने मंदिर की मान्यता को लेकर लक्सर में व स्थानीय ग्रामीणों से बात की उन्होंने बताया कि मंदिर काफी प्राचीन है।पौराणिक काल से जुड़ा अस्तित्व होने के कारण इसकी मान्यता और अधिक हो जाती है।ग्रामीणों ने बताया कि यह एक ऐसी जगह है जहां गंगा पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है जबकि गंगा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है।देश का मात्र एक ऐसा स्थान मचलेश्वर है इस जगह पांडव के पूर्वज यहां आए थे।और उन्होंने जलती अग्नि में अपने आप को समर्पित कर अपने प्राण त्याग दिए थे।दूसरी मान्यता यह भी है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने कुछ समय इसी जगह पर गुजारा था।यहां गंगा के किनारे 5 बह्मवृक्ष हुआ करते थे जो आज भी मौजूद है।क्षेत्र की सबसे ऊंची जगह होने के कारण बरसात में पांडवों यही ठहरे थे। लेकिन आज सरकार की अनदेखी के कारण यह तीर्थस्थान अपना दम तोड़ रहा है।अपनी पहचान खो रहा है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि पहले इस स्थान पर देश-विदेश के लोग आते थे।लेकिन जब से सरकार ने नीलधारा गंगा से निकलने वाला स्रोत बंद किया है।तभी लोगों ने यहां आना बंद कर दिया है।अब यहां केवल आसपास के लोग ही आते हैं।इस स्थान से लोगों की श्रद्धा आज भी जुड़ी है हरीश रावत सरकार ने यहा कुछ पैसा खर्च किया था।और गंगा किनाते घाट बनाए लेकिन मंदिर को अनदेखा कर दिया गया।लोगों की लंबे समय से की जा रही मांग पर भी सरकार द्वारा कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

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